Arihant Vandanavali Lyrics With Hindi | Jain Stuti Lyrics | ऐवा प्रभु अरिहंतने पंचांग भावे हुं नमुं…

Arihant Vandanavali
Jain Stuti Lyrics

ऐवा प्रभु अरिहंतने पंचांग भावे हुं नमुं

Arihant Vandanavali Lyrics With Hindi | Jain Stuti Lyrics | ऐवा प्रभु अरिहंतने पंचांग भावे हुं नमुं…



जे चौद महास्वप्नो थकी, निज मातने हरखावता,
वळी गर्भमांहि ज्ञानत्रयने, गोपवी अवधारता;
ने जन्मता पहेला ज चोसठ, इन्द्र जेने वंदता,
ऐवा प्रभु अरिहंतने, पंचांग भावे हुं नमुं…

महायोगना साम्राजयमां, जे गर्भमां उल्लासता,
ने जन्मतां त्रण लोकमां, महासूर्य सम परकाशता;
जे जन्मकल्याण वडे, सहु जीवने सुख अर्पता,
ऐवा प्रभु अरिहंतने, पंचांग भावे हुं नमुं…

छप्पन दिग् कुमरी तणी, सेवा सुभावे पामता,
देवेन्द्र करसंपुट महीं, धारी जगत हरखावता;
मेरुशिखर सिंहासने जे नाथ जगना शोभता;
ऐवा प्रभु अरिहंतने, पंचांग भावे हुं नमुं…

कुसुमांजलिथी सुरअसुर जे, भव्य जिनने पूजता,
क्षीरोदधिना न्हवण जलथी, देव जेने सिंचता;
वळी देवदुंदुभि नाद गजवी, देवताओ रीझता,
ऐवा प्रभु अरिहंतने, पंचांग भावे हुं नमुं…

मधमध थतां गोशीर्ष चंदनथी विलेपन पामता,
देवेन्द्र दैवी पुष्पनी, माळा गळे आरोपता;
कुंडल कडां मणिमय चमकता, हार मुकुटे शोभता,
ऐवा प्रभु अरिहंतने, पंचांग भावे हुं नमुं…

ने श्रेष्ट वेणु मोरली, वीणा मृदंगतणा ध्वनि,
वाजिंत्र ताले नृत्य करती, किन्नरीओ स्वर्गनी;
हर्ष भरी देवांगनाओ, नमन करती लळी लळी,
ऐवा प्रभु अरिहंतने, पंचांग भावे हुं नमुं…

जयनाद करता देवताओ, हर्षना अतिरेकमां,
पधरामणी करता, जनेताना महा प्रासादमां;
जे इन्द्रपूरित वरसुधाने, चूसता अंगुष्ठमां,
ऐवा प्रभु अरिहंतने, पंचांग भावे हुं नमुं…

आहार ने निहार जेना, छे अगोचर चक्षुथी,
प्रस्वेद व्याधि मेल जेना, अंगने स्पर्शे नहि;
स्वर्धेनु दुग्धसमां रुधिर ने, मांस जेना तन महीं,
ऐवा प्रभु अरिहंतने, पंचांग भावे हुं नमुं…

मंदार पारिजात सौरभ, श्वास ने उच्छवासमां,
ने छत्र चामर जयपताका, स्तंभ जव करपादमां;
पूरा सहस्त्र विशेष अष्टक, लक्षणो ज्यां शोभता,
ऐवा प्रभु अरिहंतने, पंचांग भावे हुं नमुं…

देवांगनाओ पांच आज्ञा, इन्द्रनी सन्मानती,
पांचे बनी धात्री दिले, कृतकृत्यता अनुभावती;
वळी बाळक्रीडा देवगणना, कुंवरो संगे थती,
ऐवा प्रभु अरिहंतने, पंचांग भावे हुं नमुं…

जे बाल्य वयमां प्रौढ- ज्ञाने, मुग्ध करता लोकने,
सोळे कळा विज्ञान केरा, सारने अवधारीने;
त्रण लोकमां विस्मय समा, गुण रूप यौवन युक्त जे,
ऐवा प्रभु अरिहंतने, पंचांग भावे हुं नमुं…

मैथुन-परिषहथी रहित जे, नंदता निजभावमां,
जे भोगकर्म निवारवा, विवाह-कंकण धारता;
ने ब्रह्मचर्य तणो जगाव्यो, नाद जेणे विश्वमां,
ऐवा प्रभु अरिहंतने, पंचांग भावे हुं नमुं…

मूर्छा नथी पाम्या मनुजना, पांच भेदे भोगमां,
उत्कृष्ट जेनी राज्य-नीतिथी, प्रजा सुखचेनमां;
वळी शुद्ध अध्यवसायथी, जे लीन छे निजभावमां,
ऐवा प्रभु अरिहंतने, पंचांग भावे हुं नमुं…

पाम्या स्वयं संबुद्धपद जे, सहज वर विरागवंत,
ने देव लोकांतिक धणी, भक्ति थकी करता नमन;
जेने नमी कृतार्थ बनता, चारगतिना जीवगण,
ऐवा प्रभु अरिहंतने, पंचांग भावे हुं नमुं…

आवो पधारो इष्ट वस्तु, पामवा नर-नारीओ,
ए धोषणाथी अपेता, सांवत्सरिक महादानने;
ने छेदता दारिद्रय सौनुं, दानना महाकल्पथी,
ऐवा प्रभु अरिहंतने, पंचांग भावे हुं नमुं…

दीक्षा तणो अभिषेक जेनो, योजता इन्द्रो मळी,
शिबिका स्वरूप विमानमां, विराजता भगवंतश्री;
अशोक पुन्नग तिलक चंपा वृक्ष शोभित वनमहीं,
ऐवा प्रभु अरिहंतने, पंचांग भावे हुं नमुं…

श्री वज्रधर इन्द्रे रचेला, भव्य आसन ऊपरे,
बेसी अलंकारो, त्यजे, दीक्षा समय भगवंत जे;
जे पंचमुष्टिलोच करता, केश विभु निजकर वडे,
ऐवा प्रभु अरिहंतने, पंचांग भावे हुं नमुं…

लोकग्रगत भगवंत सर्वे, सिद्धने वंदन करे,
सावध सघळा पाप-योगोना करे पच्चक्खाणने;
जे ज्ञान-दर्शन ने महा-चरित्र रत्नत्रयी ग्रहे,
ऐवा प्रभु अरिहंतने, पंचांग भावे हुं नमुं…

निर्मळ विपुलमति मन:पर्यव, ज्ञान सह जे दीपता,
वळी पंचसमिति गुप्तित्रयनी रयणमाळा धारता;
दशभेदथी जे श्रमण सुंदर, धर्मनुं पालन करे,
ऐवा प्रभु अरिहंतने, पंचांग भावे हुं नमुं…

पुष्कर कमलनां पत्रनी, भांति नहि लेपाय जे,
ने जीवनी माफक अप्रतिहत, वरगतिए विचरे;
आकाशनी जेम निरालंबन, गुण थकी जे ओपता,
ऐवा प्रभु अरिहंतने, पंचांग भावे हुं नमुं…

ने अस्खलित वायु समुहनी, जेम जे निर्बंध छे,
संगोपितांगोपांग जेना, गुप्त ईन्द्रिय देह छे;
निस्संगता य विहंग शी, जेना अमुलख गुण छे,
ऐवा प्रभु अरिहंतने, पंचांग भावे हुं नमुं…

खड्गीतणा वरशृंग जेवा, भावथी एकाकी जे,
भारंडपंखी सारीखा, गुणवान अप्रमत्त छे;
व्रतभार वहेवा वरवृषभनी, जेम जेह समर्थ छे,
ऐवा प्रभु अरिहंतने, पंचांग भावे हुं नमुं…

कुंजरसमा शूरवीर जे छे, सिंहसम निर्भय वळी,
गंभीरता सागर समी, जेना ह्रदयने छे वरी;
जेना स्वभावे सौम्यता छे, पूर्णिमाना चंद्रनी,
ऐवा प्रभु अरिहंतने, पंचांग भावे हुं नमुं…

आकाश भूषण सूर्य जेवा, दीपता तप-तेजथी,
वळी पूरता दिगंतने, करुणा उपेक्षा मैत्रीथी;
हरखावता ज विश्वने, मुदितातणा संदेशथी,
ऐवा प्रभु अरिहंतने, पंचांग भावे हुं नमुं…

जे शरदऋतुना जल समा, निर्मळ मनोभावो वडे,
उपकार काज विहार करता, जे विभिन्न स्थळो विषे;
जेनी सहनशक्ति समीपे, पृथ्वी पण झांखी पडे,
ऐवा प्रभु अरिहंतने, पंचांग भावे हुं नमुं…

बहु पुण्यनो ज्यां उदय छे, एवा भविकना द्वारने,
पावन करे भगवंत निज तप, छठ्ठ अठ्ठम पारणे;
स्वीकारता आहार बेंतालीस, दोष विहीन जे,
ऐवा  प्रभु अरिहंतने, पंचांग भावे हुं नमुं…

उपवास मासखमण समा, तप आकरां तपता विभु,
वीरासनादि आसने, स्थिरता धरे जगना प्रभु;
बावीश परिषहने सहंता, खूब जे अदभुत विभु,
ऐवा प्रभु अरिहंतने, पंचांग भावे हुं नमुं…

ने बाह्य अभ्यंतर बधा, परिग्रह थकी जे मुक्त छे,
प्रतिमा वहन वळी शुक्लध्याने, जे सदाय निमग्न छे;
जे क्षपकश्रेणी प्राप्त करता, मोहमल्ल विदारीने,
ऐवा प्रभु अरिहंतने, पंचांग भावे हुं नमुं…

जे पूर्ण केवळज्ञान, लोकालोकने अजवाळतुं,
जेना महासामर्थ्य केरो, पार को’ नव पामतुं;
ए प्राप्त जेणे चार घाती, कर्मने छेदी कर्युं,
ऐवा प्रभु अरिहंतने, पंचांग भावे हुं नमुं…

जे रजत सोना ने अनुपम, रत्नना त्रण गढमहीं,
सुवर्णना नव पद्ममां, पदकमलने सथापना करी;
चारे दिशा मुख चार चार, सिंहासने जे शोभता,
ऐवा प्रभु अरिहंतने, पंचांग भावे हुं नमुं…

ज्यां छत्र सुंदर उज्जवळा, शोभी रह्या शिर उपरे,
ने देवदेवी रत्न चामर, वींझता करद्वय वडे;
द्वादश गुणा वर देववृक्ष; अशोकथी य पूजाय छे,
ऐवा प्रभु अरिहंतने, पंचांग भावे हुं नमुं…

महासूर्य सम तेजस्वी शोभे, धर्मचक्र समीपमां,
भामंडले प्रभुपीठथी, आभा प्रसारी दिगंतमां;
चोमेर जानु प्रमाण पुष्पो, अर्ध्य जिनने अर्पता,
ऐवा प्रभु अरिहंतने, पंचांग भावे हुं नमुं…

ज्यां देवदुंदुभि घोष गजवे, घोषणा त्रण लोकमां,
त्रिभुवन तणा स्वामीतणी, सौए सुणो शुभदेशना;
प्रतिबोध करता देव-मानव ने वळी तिर्यंचने,
ऐवा प्रभु अरिहंतने, पंचांग भावे हुं नमुं…

ज्यां भव्य जीवोना अविकसित, खीलतां प्रज्ञाकमल,
भगवंतवाणी दिव्यस्पर्शे, दूर थतां मिथ्या वमळ;
ने देव -दानव भव्य मानव, झंखता जेनुं शरण,
ऐवा प्रभु अरिहंतने, पंचांग भावे हुं नमुं…

जे बीज भूत गणाय छे, त्रण पद चतुर्दश पूर्वना,
उप्पनेई वा विगमेई वा, धुवेई वा महातत्वना;
ए दान सुश्रुतज्ञाननुं, देनार त्रण जगतनाथ जे,
ऐवा प्रभु अरिहंतने, पंचांग भावे हुं नमुं…

ए चौदपूर्वोना रचे छे, सूत्र सुंदर सार्थ जे,
ते शिष्यगणने स्थापता, गणधर पदे जगनाथ जे;
खोले खजानो गूढ मानव जातना हित कारणे,
ऐवा प्रभु अरिहंतने, पंचांग भावे हुं नमुं…

जे धर्म तीर्थंकर चतुर्विध, संध संस्थापन करे,
महातीर्थ सम ए संधने, सुर असुर सहु वंदन करे;
ने सर्वजीवो-भूत-प्राणी सत्वशुं करुणा धरे,
ऐवा प्रभु अरिहंतने, पंचांग भावे हुं नमुं…

जेने नमे छे इन्द्र-वासुदेव ने बलभद्र सहु,
जेना चरणने चक्रवर्ती, पूजतां भावे बहु;
जेणे अनुत्तर विमानवासी, देवना संशय हण्या,
ऐवा प्रभु अरिहंतने, पंचांग भावे हुं नमुं…

जे छे प्रकाशक सहु पदार्थो, जड तथा चैतन्यता,
वर शुक्ल लेश्या तेरमे, गुणस्थानके परमात्मा;
जे अंत आयुष्यकर्मनो, करता परम उपकारथी,
ऐवा प्रभु अरिहंतने, पंचांग भावे हुं नमुं…

लोकाग्रभागे पहोंचवाने, योग्य क्षेत्री जे बने,
ने सिद्धना सुख अर्पती, अंतिम तपस्या जे करे;
जे चौदमा गुणस्थानके, स्थिर प्राप्त शैलेशीकरण,
ऐवा प्रभु अरिहंतने, पंचांग भावे हुं नमुं…

हर्ष भरेला देवनिर्मित , अंतिमे समवसरणे,
जे शोभता अरिहंत, परमात्मा जगतघर आंगणे;
जे नामना संस्मरणथी, विखराय वादळ दु:खना,
ऐवा प्रभु अरिहंतने, पंचांग भावे हुं नमुं…

जे कर्मनो संयोग, वळगेलो अनादि काळथी,
तेथी थया जे मुक्त पूरण, सर्वथा सदभावथी;
रममाणं जे निजरूपमां, ने सर्वजगतुं हित करे,
ऐवा प्रभु अरिहंतने, पंचांग भावे हुं नमुं…

जे नाथ ऐदारिक वळी, तैजस तथा कार्मण तनु,
ए सर्वने छोडी अहीं, पाम्या परमपद शाश्वतुं;
जे रागद्वेष-जळे भर्या, संसार सागरने तर्या,
ऐवा प्रभु अरिहंतने, पंचांग भावे हुं नमुं…

शैलेशी करणे भाग त्रीजे, शरीरना ओछा करी,
प्रदेश जीवना धन करी, वळी पूर्वध्यान-प्रयोगथी;
धनुष्यथी छुटेल बाण तणी, परे शिवगति लही,
ऐवा प्रभु अरिहंतने, पंचांग भावे हुं नमुं…

निर्विध्न स्थिर ने अचल अक्षय, सिद्धगति ए नामनुं,
छे स्थान अव्याबाध ज्यांथी, नहि पुन:फरवापणुं;
ए स्थानने पाम्या अनंता, ने वळी जे पामशे,
ऐवा प्रभु अरिहंतने, पंचांग भावे हुं नमुं…

आ स्तोत्रने प्राकृतगिरामां, वर्णव्युं भक्तिबळे,
अज्ञात ने प्राचीन महामना को’ मुनीश्वर बहुश्रुते;
पद-पद महीं जेना महा-सामर्थ्यनो महिना मळे,
ऐवा प्रभु अरिहंतने, पंचांग भावे हुं नमुं…

जे नमस्कार-स्वाध्यायमां, प्रेक्षी र्हदय गदगद बन्युं,
“श्री चंद्र” नाच्यो ग्रंथ लई, महाभागनुं शरणुं मल्युं;
कीधी करावी अल्पभक्ति, होंशनुं तरणुं फळ्युं,
ऐवा प्रभु अरिहंतने, पंचांग भावे हुं नमुं…

जेना गुणोना सिंधुना बे, बिंदु पण जाणुं नहि,
पण एक श्रद्धा दिलमहीं के नाथ समको’ छे नहि;
जेना सहारे क्रोड तरीया, मुक्ति मुजनिश्चय सहि,
ऐवा प्रभु अरिहंतने, पंचांग भावे हुं नमुं…

जे नाथ छे त्रण भवनना, करुणा जगे जेनी वहे,
जेना प्रभावे विश्वमां, सदभावनी सरणी वहे;
आपे वचन “श्री चंद्र” जगने, एज निश्वय तारशे,
ऐवा प्रभु अरिहंतने, पंचांग भावे हुं नमुं…


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